GPM क्षेत्र में समुदाय और सामाजिक जीवन
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिला, छत्तीसगढ़ | Community & Social Life
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिला छत्तीसगढ़ राज्य का एक नवगठित जिला है, जिसे 11 फरवरी 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा बिलासपुर जिले से अलग करके छत्तीसगढ़ के 28वें जिले के रूप में स्थापित किया गया। गौरेला इस जिले का मुख्यालय है।
यह जिला पूर्व में कोरिया और कोरबा, दक्षिण में बिलासपुर और मुंगेली, तथा उत्तर-पश्चिम में मध्य प्रदेश के अनूपुर जिले से घिरा हुआ है। पहाड़ी और वन-प्रधान इस क्षेत्र की जनसंख्या, भाषा, संस्कृति और सामाजिक ढाँचा इसे छत्तीसगढ़ में एक विशेष स्थान देता है।
GPM की जनसंख्या और सामाजिक संरचना
2011 की जनगणना के अनुसार, GPM जिले की कुल जनसंख्या 3,36,420 है। इस जिले का लिंगानुपात 997 महिलाएँ प्रति 1000 पुरुष है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर है और महिलाओं की सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
जिले की साक्षरता दर 55.92% है, जिसमें और सुधार की आवश्यकता है। जिले की मात्र 9.60% जनसंख्या (लगभग 32,285 लोग) शहरी क्षेत्रों में निवास करती है, जबकि शेष 90% से अधिक आबादी ग्रामीण परिवेश में जीवन व्यतीत करती है।
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जनजातीय समुदाय — GPM की पहचान
GPM जिले की सबसे बड़ी विशेषता इसका जनजातीय बहुल स्वरूप है। जिले की कुल जनसंख्या का 57.09% (लगभग 1,92,073 लोग) अनुसूचित जनजाति (ST) से हैं। यह आँकड़ा इस क्षेत्र को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण आदिवासी जिलों में शामिल करता है।
अनुसूचित जाति (SC) वर्ग की आबादी 6.18% (लगभग 20,802) है। इस प्रकार GPM एक विविध सामाजिक ताने-बाने वाला जिला है जहाँ आदिवासी, दलित, पिछड़े और सामान्य वर्ग के लोग सद्भावना के साथ रहते हैं।
भाषा और सांस्कृतिक पहचान
GPM जिले में भाषाई विविधता देखने को मिलती है। 2011 की जनगणना के अनुसार:
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छत्तीसगढ़ी भाषा — 74.59% लोगों की मातृभाषा
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हिंदी भाषा — 23.48% लोगों की मातृभाषा
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अन्य भाषाएँ — 1.93%
छत्तीसगढ़ी यहाँ की जनभाषा है जो लोगों के दैनिक जीवन, लोकगीतों, त्योहारों और सामाजिक व्यवहार में रची-बसी है। आदिवासी समुदायों की अपनी स्थानीय बोलियाँ भी हैं जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को और बढ़ाती हैं।
GPM का ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व
पेंड्रा जमींदारी का इतिहास
GPM क्षेत्र का सामाजिक इतिहास अत्यंत रोचक है। पेंड्रा जमींदारी में कुल 774 वर्गमील क्षेत्र और 225 गाँव थे। कहा जाता है कि रतनपुर के कलचुरी राजा के आश्रय में रहने वाले हिंदू सिंह और छिंदू सिंह नाम के दो भाइयों को उनकी ईमानदारी के पुरस्कारस्वरूप पेंड्रा जमींदारी दी गई थी। यह जमींदारी उनके वंश में 12 पीढ़ियों तक चली।
मराठा काल में पेंड्रागढ़ पिंढारियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। पिंढारे डाकुओं के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम पिंढारा पड़ा, जो बाद में पेंड्रा हो गया।

पत्रकारिता का उद्गम स्थल
GPM क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान यह है कि छत्तीसगढ़ का पहला समाचार पत्र "छत्तीसगढ़ मित्र" वर्ष 1900 में पेंड्रा से ही प्रकाशित हुआ था। इसका संपादन पंडित माधवराव सप्रे ने किया था। यह तथ्य इस क्षेत्र की बौद्धिक और सामाजिक जागरूकता का प्रमाण है।
धर्म और आस्था — समुदाय की आत्मा
GPM जिले में हिंदू धर्म बहुसंख्यक है, लेकिन यहाँ अन्य धर्मों के अनुयायी भी सह-अस्तित्व के साथ रहते हैं। आदिवासी समुदायों की अपनी प्रकृति-पूजा परंपरा भी मजबूत है।
यहाँ के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल हैं:
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मरहीमाता मंदिर, भाँवरटंक — क्षेत्र का प्रसिद्ध शक्तिपीठ
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काली मंदिर, पेंड्रा — आस्था का केंद्र
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दुर्गा मंदिर, धनपुर — धार्मिक सद्भाव का प्रतीक
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जलेश्वरधाम — शिव भक्तों का तीर्थस्थल
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अमरेश्वर महादेव मंदिर — प्रमुख धार्मिक आस्था केंद्र
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बाबा हजरत सैयद इंसान अली दरगाह, लारखेनी — सामाजिक एकता का प्रतीक
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कबीर का चबूतरा, केओची — संत कबीर की स्मृति से जुड़ा स्थान
ये धार्मिक स्थल केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक मिलन, सांप्रदायिक सद्भाव और सामूहिक पहचान के प्रतीक भी हैं।
GPM क्षेत्र का आर्थिक और सामाजिक जीवन
कृषि और ग्रामीण जीवन
GPM जिला मुख्य रूप से कृषि प्रधान है। यहाँ उत्पादित चावल की गुणवत्ता पूरे देश में प्रसिद्ध है। जिला न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत में अपनी उत्कृष्ट चावल की किस्म और आदिवासी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण जाना जाता है।
ग्रामीण समुदायों में सामूहिक खेती, वन उत्पादों का संग्रह और पशुपालन जीवनयापन के प्रमुख साधन हैं। आदिवासी समाज की सामूहिकता की भावना यहाँ के सामाजिक ढाँचे की नींव है। स्थानीय किराना स्टोर और मसाला विक्रेता ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

वन और प्रकृति के साथ जीवन
GPM जिले का बड़ा हिस्सा अचानकमार टाइगर रिजर्व और बायोस्फीयर रिजर्व से घिरा है। यहाँ के आदिवासी समुदाय सदियों से वनों के साथ सहजीवन अपनाते आए हैं। वन संपदा इनके सामाजिक और आर्थिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
सामाजिक त्योहार और लोक संस्कृति
GPM क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है। यहाँ मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में शामिल हैं:
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हरेली — छत्तीसगढ़ का प्रमुख कृषि पर्व, जो किसानों के सामाजिक जीवन का उत्सव है
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पोला — बैलों की पूजा का पर्व, जो ग्रामीण कृषि समाज की पहचान है
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नवाखाई — नई फसल का स्वागत करने का पारंपरिक उत्सव
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दीपावली, होली, दशहरा — हिंदू त्योहार जो पूरे समुदाय को एकजुट करते हैं
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आदिवासी मड़ई और मेले — जो जनजातीय समाज की पहचान और एकता के प्रतीक हैं
लोकगीत, करमा नृत्य, सुआ नृत्य और राउत नाचा जैसी लोककलाएँ GPM के सामाजिक जीवन को रंगीन और जीवंत बनाती हैं। पारंपरिक हस्तनिर्मित उत्पाद और स्थानीय हस्तशिल्प इस सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं।
शिक्षा और सामाजिक विकास
GPM जिले में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास जारी हैं। हालाँकि जिले की साक्षरता दर 55.92% है, जिसे राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। आश्रम शालाएँ और एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

पर्यटन और सामाजिक जुड़ाव
GPM के पर्यटन स्थल यहाँ के सामाजिक जीवन को बाहरी दुनिया से जोड़ते हैं। प्रमुख स्थल हैं:
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अचानकमार टाइगर रिजर्व — वन्यजीव और प्रकृति प्रेमियों का गंतव्य
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पांडव गुफा, धनपुर — ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का स्थान
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राजमहल, पेंड्रा — जमींदारी काल की ऐतिहासिक धरोहर
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झोझा जलप्रपात, बस्ती — प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र
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लक्ष्मण घाट, खरदी — धार्मिक और सामाजिक मिलन बिंदु
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गंगनई बाँध, सलहेकोता — प्रकृति के बीच सामाजिक जुड़ाव का स्थान
ये स्थान न केवल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी समृद्ध करते हैं। पारंपरिक रसोई के बर्तन और स्थानीय व्यंजन पर्यटकों को GPM की संस्कृति से जोड़ते हैं।
GPM की सामाजिक चुनौतियाँ और संभावनाएँ
GPM एक नवगठित जिला होने के कारण यहाँ बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अभी भी विकास की आवश्यकता है। आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ना, उनकी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए विकास करना — यह GPM के सामने सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी संभावना दोनों है।
छत्तीसगढ़ सरकार की नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी जैसी योजनाएँ ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के सामाजिक-आर्थिक जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।
निष्कर्ष
GPM जिला — गौरेला, पेंड्रा और मरवाही — तीन नगरों का एक अनूठा संगम है, जहाँ इतिहास, परंपरा, आदिवासी संस्कृति और आधुनिकता मिलकर एक समृद्ध सामाजिक जीवन का निर्माण करती हैं। यहाँ की 57% से अधिक आदिवासी आबादी, उनकी भाषा, लोककलाएँ, धार्मिक आस्था और सामूहिक जीवनशैली इस जिले को छत्तीसगढ़ की आत्मा का प्रतिनिधि बनाती है।
चावल की उत्कृष्ट खेती से लेकर छत्तीसगढ़ की पहली पत्रकारिता तक, GPM का योगदान अतुलनीय है। यह जिला भविष्य में सांस्कृतिक पर्यटन, जैव विविधता और आदिवासी विकास के क्षेत्र में एक मॉडल बन सकता है।