गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) छत्तीसगढ़ का सबसे नया जिला है। यह जिला 10 फरवरी 2020 को बिलासपुर जिले से अलग करके बनाया गया था और राज्य का 28वां जिला बना। जिले में तीन तहसील हैं, गौरेला, पेंड्रा और मरवाही। पहाड़ी और वनाच्छादित भूगोल के बीच बसे इस जिले में खेती-किसानी आज भी अधिकतर लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है। जिले की करीब 90 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, और यहां की खेती की पहचान चावल की गुणवत्ता और आदिवासी कृषि परंपराओं से जुड़ी हुई है। इस लेख में हम GPM जिले की कृषि व्यवस्था, प्रमुख फसलें, सिंचाई के साधन, सरकारी योजनाएं और आदिवासी कृषि परंपराओं को विस्तार से समझेंगे।
जिले की भौगोलिक और जलवायु विशेषताएं जो खेती को प्रभावित करती हैं
GPM जिला मैकल पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा है और छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। जिले का भूगोल पहाड़ी, ऊंचा-नीचा और घने जंगलों से घिरा हुआ है, जिसका सीधा असर यहां की खेती के तरीके पर पड़ता है।
| विशेषता | जानकारी |
|---|---|
| क्षेत्रफल | लगभग 2307.39 वर्ग किलोमीटर |
| मुख्यालय | गौरेला |
| तहसील | गौरेला, पेंड्रा, मरवाही |
| प्रमुख पर्वत श्रृंखला | मैकल पर्वत |
| प्रमुख नदियां | अरपा नदी, सोन नदी |
| प्रमुख वन क्षेत्र | अचानकमार टाइगर रिजर्व, अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व (यूनेस्को मान्यता प्राप्त) |
| जनसंख्या (2011 जनगणना) | लगभग 3,36,420 |
| ग्रामीण जनसंख्या | करीब 90 प्रतिशत |
अरपा नदी का उद्गम जिले के पेंड्रा-लोरमी पठार में स्थित खोड़री पहाड़ी से होता है और यह महानदी की सहायक नदी है। वहीं सोन नदी का उद्गम पेंड्रारोड तहसील की बंजारी पहाड़ी से होता है, जो आगे चलकर गंगा की सहायक नदी बनती है। ये दोनों नदियां जिले में जल स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जलवायु की बात करें तो पेंड्रा क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सबसे ठंडे इलाकों में गिना जाता है। समुद्र तल से अधिक ऊंचाई और घने वन क्षेत्र के कारण यहां सर्दियों में तापमान काफी नीचे चला जाता है, कई बार 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास या उससे भी कम दर्ज किया जाता है। पेंड्रा में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1462 मिलीमीटर रहती है, जो खरीफ फसलों खासकर धान के लिए अनुकूल मानी जाती है। मानसून जून के मध्य में दस्तक देता है और सितंबर तक सक्रिय रहता है, यही समय जिले की खेती का सबसे महत्वपूर्ण मौसम होता है।
GPM जिले की प्रमुख फसलें
पहाड़ी और जंगली भूभाग होने के बावजूद जिले में कृषि योग्य भूमि पर पारंपरिक तरीके से खेती की जाती है। यहां की मुख्य फसलों को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है, खरीफ फसलें, रबी फसलें और मोटे अनाज।
खरीफ फसलें
- धान, जिले की सबसे प्रमुख और मुख्य फसल है
- मक्का
- दलहनी फसलें (दाल वाली फसलें)
- तिलहनी फसलें
धान यहां की पहचान है। पूरे छत्तीसगढ़ और देश में GPM जिला अपने चावल की खास गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। यहां की आदिवासी बहुल आबादी और उपजाऊ मानसूनी परिस्थितियां मिलकर धान की खेती को जिले की अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाती हैं।
रबी फसलें
खरीफ सीजन के बाद रबी मौसम में किसान गेहूं, चना और अन्य दलहन-तिलहन फसलें लेते हैं। हाल के वर्षों में कृषि विभाग द्वारा किसानों को रबी मौसम में सिर्फ धान पर निर्भर न रहकर दूसरी फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि मिट्टी की सेहत बनी रहे और किसानों की आमदनी के स्रोत भी बढ़ें।
मोटे अनाज (मिलेट)
GPM जिला छत्तीसगढ़ के उन जिलों में शामिल है जहां कोदो, कुटकी और रागी जैसे परंपरागत मोटे अनाज उगाए जाते हैं। ये फसलें खासतौर पर आदिवासी क्षेत्रों में सदियों से उगाई जाती रही हैं और अब राज्य सरकार की मिलेट मिशन योजना के तहत इन्हें फिर से बढ़ावा दिया जा रहा है।
विष्णुभोग चावल: जिले की खास पहचान
GPM जिले की खेती में विष्णुभोग चावल का जिक्र जरूर होना चाहिए। यह एक पारंपरिक और सुगंधित चावल की किस्म है जो लंबे समय से इस क्षेत्र की खास पहचान रही है। समय के साथ इसका रकबा घटता गया था, लेकिन अब जिला प्रशासन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की बिहान योजना के तहत महिला स्व-सहायता समूहों ने इस चावल को जैविक तरीके से फिर से उगाना और बाजार तक पहुंचाना शुरू किया है।
अरपा बिहान महिला स्व-सहायता समूह जैसी संस्थाओं की महिलाएं जैविक विधि से विष्णुभोग धान की खेती, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम कर रही हैं। यह जैविक विष्णुभोग चावल राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है और इसे प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों को भेंट भी किया जा चुका है। इस पहल से ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिल रहा है और स्थानीय कृषि परंपरा भी संरक्षित हो रही है।
धान उपार्जन (खरीदी) की व्यवस्था
छत्तीसगढ़ को "धान का कटोरा" कहा जाता है, और GPM जिला भी हर साल समर्थन मूल्य पर बड़े पैमाने पर धान खरीदी में शामिल होता है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में राज्य सरकार किसानों से 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक धान खरीद रही है।
जिले में धान खरीदी कई उपार्जन केंद्रों के माध्यम से की जाती है। वर्ष 2026 के खरीफ सीजन में जनवरी माह तक जिले में 13 लाख क्विंटल से अधिक धान की खरीदी हो चुकी थी। कुछ प्रमुख केंद्रों पर हुई खरीदी इस प्रकार रही:
| उपार्जन केंद्र | खरीदी (क्विंटल में, अनुमानित) |
|---|---|
| पेण्ड्रा | लगभग 79,920 |
| भर्रीडांड़ | लगभग 81,985 |
| नवागांव पेण्ड्रा | लगभग 69,788 |
| देवरीकला | लगभग 67,702 |
| निमधा | लगभग 63,728 |
| खोडरी | लगभग 60,256 |
| परासी | लगभग 60,141 |
| मरवाही | लगभग 54,254 |
| तरईगांव | लगभग 53,699 |
| गौरेला | लगभग 47,800 |
धान खरीदी अब पूरी तरह डिजिटल व्यवस्था के तहत होती है। किसानों को एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन कराना होता है, जिसके बाद उन्हें एक यूनिक फार्मर आईडी मिलती है। टोकन व्यवस्था के जरिए धान बेचने की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी बनाई गई है, और भुगतान सीधे किसानों के बैंक खाते में 48 घंटे के भीतर हो जाता है।
सिंचाई की व्यवस्था
जिले का अधिकांश भूभाग पहाड़ी और ऊंचा-नीचा होने के कारण बड़ी सिंचाई परियोजनाएं सीमित हैं, इसलिए यहां छोटी जलाशय, एनीकट और व्यपवर्तन योजनाओं का महत्व ज्यादा है। जिला प्रशासन के अनुसार जिले में कई सिंचाई परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनमें शामिल हैं:
- कुम्हारी व्यपवर्तन योजना
- करहनि एनीकट योजना
- सोनाकछार जलाशय योजना
- कोटरियाडांड व्यपवर्तन योजना
- बस्ती व्यपवर्तन योजना
- घुरदेवा व्यपवर्तन योजना
इनके अलावा कई किसान निजी कुओं और नलकूपों के जरिए भी अपने खेतों की सिंचाई करते हैं। धान बेचकर मिली राशि से कुएं और अन्य सिंचाई साधन बनवाने की मिसालें भी सामने आई हैं, जिससे किसान बहुफसलीय खेती की ओर बढ़ रहे हैं।
मिलेट मिशन: कोदो, कुटकी और रागी को बढ़ावा
छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश को मिलेट हब बनाने के लिए मिलेट मिशन शुरू किया है। इसके तहत राज्य के 20 जिलों के 85 विकासखंडों में मोटे अनाज का उत्पादन होता है, और GPM जिला भी इसमें शामिल राज्य के प्रमुख आदिवासी जिलों में से एक है। इस योजना के तहत:
- कोदो, कुटकी और रागी की समर्थन मूल्य पर खरीदी की जाती है
- किसानों को उन्नत तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराए जाते हैं
- राज्य सरकार ने भारतीय मिलेट अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के साथ समझौता किया है
- छोटे-छोटे प्रसंस्करण और पैकेजिंग केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं
इस मिशन का मकसद मोटे अनाज उगाने वाले किसानों की आमदनी बढ़ाना, कुपोषण की समस्या कम करना और परंपरागत फसलों को नई पहचान दिलाना है।
आदिवासी समुदाय और परंपरागत कृषि संस्कृति
GPM जिले में गोंड और बैगा जनजाति की बड़ी आबादी रहती है, और 2011 जनगणना के अनुसार जिले की करीब 57 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जनजाति (ST) से है। इन समुदायों की जीवनशैली वन संसाधनों और परंपरागत खेती के तरीकों से गहराई से जुड़ी हुई है। खेती यहां केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का भी हिस्सा है।
- बैगा जनजाति द्वारा मनाया जाने वाला पोला पर्व, बैलों की पूजा से जुड़ा एक कृषि संबंधी पर्व है, जो बुवाई के मौसम के समापन पर मनाया जाता है।
- गोंड जनजाति का माड़ई पर्व, मानसून की फसल कटाई के बाद आयोजित होता है, जिसमें मेले, संगीत और नृत्य के जरिए देवी-देवताओं की आराधना की जाती है।
ये त्योहार बताते हैं कि जिले की कृषि परंपरा प्रकृति, समुदाय और आस्था से किस तरह जुड़ी हुई है।
सरकारी योजनाएं और किसान कल्याण
जिले में किसानों के हित में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं:
- समर्थन मूल्य पर धान, कोदो, कुटकी और रागी की खरीदी
- एग्रीस्टैक पोर्टल के जरिए किसानों का डिजिटल पंजीयन और यूनिक फार्मर आईडी
- परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती को बढ़ावा
- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत महिला स्व-सहायता समूहों को जैविक खेती और उत्पाद विपणन में सहयोग
- रबी सीजन में फसल विविधीकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहन
- विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) जैसी नई योजनाओं का जिला स्तर पर शुभारंभ
जिले की खेती से जुड़ी चुनौतियां
- पहाड़ी और वनाच्छादित भूभाग के कारण बड़ी सिंचाई परियोजनाएं सीमित हैं
- अधिकांश खेती आज भी मानसून पर निर्भर है
- सर्दियों में बहुत कम तापमान का असर कुछ फसलों पर पड़ता है
- छोटी जोत और सीमित संसाधनों के कारण आदिवासी किसानों के लिए आधुनिक तकनीक अपनाना आसान नहीं होता
- वन क्षेत्र से सटे गांवों में खेती और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक चुनौती है
भविष्य की संभावनाएं
GPM जिले में कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ने की काफी संभावनाएं हैं। विष्णुभोग जैसी पारंपरिक चावल किस्मों की जैविक ब्रांडिंग, मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा, छोटी सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार और महिला स्व-सहायता समूहों की भागीदारी से आने वाले वर्षों में जिले की खेती को नई पहचान मिल सकती है। साथ ही, जिले में मौजूद प्राकृतिक सुंदरता, टाइगर रिजर्व और बायोस्फीयर रिजर्व से कृषि पर्यटन को जोड़कर भी किसानों की आय के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।
निष्कर्ष
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला भले ही छत्तीसगढ़ का सबसे नया जिला हो, लेकिन यहां की कृषि परंपरा सदियों पुरानी और समृद्ध है। धान की गुणवत्ता, विष्णुभोग चावल की खुशबू, मोटे अनाज की वापसी और आदिवासी समुदायों की परंपरागत खेती मिलकर इस जिले को छत्तीसगढ़ की कृषि विरासत का एक खास हिस्सा बनाते हैं। सरकारी योजनाओं और डिजिटल व्यवस्थाओं के साथ अब यह जिला अपनी खेती को नई दिशा देने की ओर आगे बढ़ रहा है।
FAQs
1. GPM जिले की सबसे प्रमुख फसल कौन सी है?
धान (चावल) यहां की सबसे प्रमुख और मुख्य फसल है। जिला अपने चावल की गुणवत्ता के लिए राज्य और देश भर में जाना जाता है।
2. विष्णुभोग चावल क्या है?
विष्णुभोग एक पारंपरिक, सुगंधित चावल की किस्म है जो GPM जिले की खास पहचान है। इसे अब महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा जैविक तरीके से उगाया और बेचा जा रहा है।
3. जिले में धान का समर्थन मूल्य क्या है?
खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में सरकार 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से, प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक धान खरीद रही है।
4. जिले में कौन-कौन से मोटे अनाज उगाए जाते हैं?
जिले में कोदो, कुटकी और रागी जैसे परंपरागत मोटे अनाज उगाए जाते हैं, जिन्हें राज्य की मिलेट मिशन योजना के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है।
5. जिले में सिंचाई के मुख्य साधन क्या हैं?
जिले में कुम्हारी व्यपवर्तन योजना, करहनि एनीकट योजना और सोनाकछार जलाशय योजना जैसी परियोजनाओं के साथ-साथ निजी कुएं और नलकूप सिंचाई के मुख्य साधन हैं।