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GPM क्षेत्र की लोक कला, संगीत और नृत्य

GPM क्षेत्र की लोक कला, संगीत और नृत्य: एक सांस्कृतिक धरोहर की अनमोल झलक

जहाँ जंगल बोलते हैं और ढोल गाते हैं

छत्तीसगढ़ के उत्तरी छोर पर बसा गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिला न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि यहाँ की जीवंत लोक संस्कृति पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान रखती है। 10 फरवरी 2020 को बिलासपुर जिले से अलग होकर छत्तीसगढ़ के 28वें जिले के रूप में अस्तित्व में आए इस जिले में घने साल के जंगल, पहाड़ियाँ और बहती नदियाँ आदिवासी संस्कृति की अद्भुत कहानियाँ सुनाती हैं।

यहाँ की कुल जनसंख्या (2011 जनगणना) 3,36,420 है, जिसमें से 57.09% अनुसूचित जनजाति की है। इस जनजातीय बहुलता ने ही GPM को एक जीवित सांस्कृतिक संग्रहालय बनाया है। यहाँ बोली जाने वाली 74.59% भाषा छत्तीसगढ़ी है, जो इस क्षेत्र के लोकगीतों और लोककलाओं की आत्मा है।

GPM क्षेत्र की प्रमुख जनजातियाँ और उनकी सांस्कृतिक पहचान

GPM जिले की लोक कला, संगीत और नृत्य को समझने के लिए यहाँ की दो प्रमुख जनजातियों — गोंड और बैगा — को जानना ज़रूरी है।

गोंड जनजाति

गोंड जनजाति GPM जिले की सबसे बड़ी आदिवासी समूह है। ये अपनी गोंडी भाषा में बात करते हैं और प्रकृति पूजा, वन देवताओं की आराधना और सामुदायिक उत्सवों को अपनी संस्कृति का आधार मानते हैं। गोंड समुदाय माड़ई उत्सव के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।

बैगा जनजाति

बैगा जनजाति छत्तीसगढ़ की 5 विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक है। ये गोंडों के पुरोहित (देवगुरु) माने जाते हैं। बैगा जनजाति का निवास GPM जिले के अलावा कबीरधाम, मुंगेली, राजनांदगांव और बिलासपुर जिलों में भी है। बैगा जनजाति की एक बड़ी सांस्कृतिक विशेषता उनकी गोदना (टैटू) कला है — ये अपने शरीर पर पारंपरिक कलाकृतियाँ गुदवाते हैं, जो उनकी पहचान और आस्था का प्रतीक होती है।

GPM क्षेत्र की लोक कलाएँ

1. गोदना कला (टैटू कला)

बैगा जनजाति की सबसे विशिष्ट लोक कला गोदना है। इसे शरीर पर पारंपरिक तरीके से उकेरा जाता है। यह कला केवल सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और जनजातीय पहचान का प्रतीक है। बैगा जनजाति को सबसे अधिक गोदना धारण करने वाली जनजाति के रूप में जाना जाता है।

2. भित्ति चित्रकला

GPM क्षेत्र के गाँवों में आदिवासी घरों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बने चित्र देखे जा सकते हैं। ये चित्र पशु-पक्षी, प्रकृति, देवी-देवताओं और जीवन के दैनिक दृश्यों को दर्शाते हैं।

3. बाँस शिल्पकला

इस वनाच्छादित क्षेत्र में बाँस बहुतायत में मिलता है। यहाँ के आदिवासी कारीगर बाँस से टोकरियाँ, घर की सजावट की वस्तुएँ, वाद्य यंत्र और दैनिक उपयोग की चीजें बनाते हैं। यह उनकी आजीविका और रचनात्मकता दोनों का प्रतीक है।

GPM क्षेत्र का लोक संगीत

GPM जिले का लोक संगीत प्रकृति, ऋतु, जीवन के सुख-दुःख और देवी-देवताओं की आराधना से जुड़ा हुआ है। यहाँ के गीत छत्तीसगढ़ी भाषा में गाए जाते हैं और इनमें मीठी बोली की झनक साफ सुनाई देती है।

प्रमुख लोकगीत

करमा गीत: यह GPM क्षेत्र के गोंड और बैगा आदिवासियों का सबसे प्रिय गीत है। करमा गीत का मुख्य स्वर शृंगार और प्रकृति के प्रति आभार है। ये गीत भादो से माघी पूर्णिमा तक के उत्सव में गाए जाते हैं।

ददरिया: यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध प्रणय गीत है, जिसे युवक-युवतियाँ एक-दूसरे को आकर्षित करने के लिए गाते हैं। GPM क्षेत्र में यह गीत विशेष रूप से खेतों और मेलों में गाया जाता है।

बिहाव गीत: विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले ये गीत पूरे उत्सव का प्राण होते हैं। इनमें नवविवाहित जोड़े की खुशी और परिवार के आशीर्वाद का वर्णन होता है।

सुवा गीत (सुआ गीत): दीपावली के अवसर पर गाए जाने वाले ये गीत महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत किए जाते हैं। एक मिट्टी का तोता (सुग्गा) धान की टोकरी में रखकर महिलाएँ घर-घर जाकर ये गीत गाती हैं।

फाग गीत: होली के अवसर पर गोंड और बैगा जनजाति द्वारा गाए जाने वाले ये गीत बसंत ऋतु की खुशी और रंगों का जश्न मनाते हैं।

रीना गीत: बैगा माताएँ अपने छोटे शिशुओं को वात्सल्य के रूप में रीना गायन से परिचित कराती हैं। यह एक प्रकार का लोरी गीत है, जो बैगा संस्कृति की कोमल अभिव्यक्ति है।

पारंपरिक वाद्य यंत्र

GPM क्षेत्र के संगीत की आत्मा यहाँ के वाद्य यंत्रों में बसती है:

  • मांदर: मिट्टी का बना दोनों सिरों से बजाया जाने वाला ढोल, जो हर उत्सव में गूँजता है।
  • ढोल: उत्सवों और नृत्यों में लय प्रदान करने वाला प्रमुख वाद्य यंत्र।
  • टीमकी (टिमकी): एक छोटा ताल वाद्य यंत्र।
  • बाँसुरी: प्रकृति के सुर को स्वर देने वाली बाँसुरी यहाँ के युवाओं में बेहद लोकप्रिय है।
  • ठिसकी: बैगा समुदाय का एक विशेष वाद्य यंत्र जिसे महिलाएँ करमा नृत्य में हाथ में थामकर बजाती हैं।
  • पैजना: पैरों में पहना जाने वाला घुंघरू जैसा वाद्य, जो नृत्य में ताल और सौंदर्य दोनों बढ़ाता है।

GPM क्षेत्र के प्रमुख लोक नृत्य

1. करमा नृत्य — जीवन, प्रकृति और आस्था का उत्सव

करमा नृत्य GPM जिले की गोंड और बैगा जनजातियों का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय लोक नृत्य है। यह नृत्य करमा देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। करमा नृत्य में बैगा पुरुष बीच में खड़े होकर मांदर-ढोल बजाते हैं और महिलाएँ एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर गोलाकार घेरे में नाचती हुई गीत गाती हैं।

यह नृत्य भादो पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा के बीच होता है। युवक-युवतियाँ टोलियाँ बनाकर एक-दूसरे के गाँव जाते हैं, जहाँ रात भर अलाव जलाकर नृत्य-गायन होता है। करमा नृत्य कई भागों में बँटा है — करमा खड़ी, करमा खाप, करमा झूलनी और करमा लहकी।

2. रीना-सैला नृत्य — बैगा जनजाति की प्रकृति से प्रीत

रीना-सैला नृत्य बैगा जनजाति का एक बेहद भावपूर्ण नृत्य है। इसमें बैगा महिलाएँ सफेद रंग की साड़ी पहनती हैं और गले में सुता-माला, कान में ढार, बांह में नागमोरी, हाथ में चूड़ी, पैर में कांसे का चूड़ा और ककनी-बनुरिया जैसे पारंपरिक आभूषण धारण करती हैं। इस नृत्य में ढोल, टीमकी, बाँसुरी और पैजना जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है।

3. सैला नृत्य (डंडा नाच) — लाठियों की लय

सैला नृत्य को डंडा नाच के नाम से भी जाना जाता है। यह जनजातीय समुदायों का शुद्ध पारंपरिक नृत्य है जिसमें पुरुष लकड़ी के डंडों से लयबद्ध ताल बजाते हुए नृत्य करते हैं। यह नृत्य GPM क्षेत्र में विशेष उत्सव के अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है।

4. बिलमा नृत्य — दशहरे की जय-जयकार

बिलमा नृत्य विजयादशमी (दशहरा) के अवसर पर GPM क्षेत्र की गोंड और बैगा जनजाति के स्त्री-पुरुष मिलकर करते हैं। यह उत्सव की खुशी और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है।

5. परघोनी नृत्य — विवाह का उल्लास

परघोनी नृत्य बैगा जनजाति का विवाह नृत्य है। यह नृत्य तब किया जाता है जब बारात दूल्हे के साथ दुल्हन के घर पहुँचती है। वर पक्ष के लोग इस नृत्य में हाथी बनकर नृत्य करते हैं, जो दूल्हे के स्वागत और उत्सव का प्रतीक है।

6. सुआ नृत्य — स्त्री मन की अभिव्यक्ति

सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ की महिलाओं का एक प्रमुख समूह नृत्य है जो GPM क्षेत्र में भी बेहद लोकप्रिय है। इसमें एक लड़की (जिसे 'सुग्गी' कहते हैं) धान से भरी टोकरी में मिट्टी का तोता रखती है। दीपावली के दिन से शुरू होकर यह नृत्य अगहन मास तक चलता है। इस नृत्य में स्त्री मन के सुख-दुःख, उनकी भावनाएँ और उनका लावण्य प्रकट होता है।

7. फाग नृत्य — होली का रंगीला उत्सव

होली के अवसर पर गोंड और बैगा जनजाति के स्त्री-पुरुष फाग नृत्य प्रस्तुत करते हैं। यह नृत्य बसंत ऋतु की आमद और होली के रंगों का उल्लासपूर्ण स्वागत करता है।

प्रमुख आदिवासी उत्सव — जहाँ कला, संगीत और नृत्य एक साथ जीवंत होते हैं

माड़ई उत्सव (Madai Festival)

GPM जिले की गोंड जनजाति का माड़ई उत्सव एक विशाल जनजातीय मेला है, जो मानसून के बाद फसल कटाई के महीनों में आयोजित होता है। इस उत्सव में समुदाय के लोग एकत्र होकर देवताओं की आराधना करते हैं, रंग-बिरंगे परिधान पहनते हैं और रात भर संगीत, नृत्य और सामूहिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है।

करमा पर्व

भादो पूर्णिमा के आस-पास मनाया जाने वाला करमा पर्व GPM क्षेत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदिवासी उत्सव है। इसमें कर्मा वृक्ष की शाखा को आँगन में स्थापित कर पूजा की जाती है और रात भर करमा गीत और नृत्य होते हैं।

हरेली, नवाखानी और छेर-छेरा

हरेली (कृषि उत्सव), नवाखानी (नई फसल का उत्सव) और छेर-छेरा (नई फसल के स्वागत का गीत उत्सव) जैसे त्योहार भी GPM क्षेत्र में धूमधाम से मनाए जाते हैं, जिनमें स्थानीय लोकगीत और नृत्य की अहम भूमिका होती है।

GPM की सांस्कृतिक विरासत: एक ऐतिहासिक दृष्टि

GPM जिले के पेंड्रा का एक गौरवशाली साहित्यिक इतिहास भी है। पंडित माधवराव सप्रे के संपादन में वर्ष 1900 में पेंड्रा से ही छत्तीसगढ़ का पहला समाचार पत्र 'छत्तीसगढ़ मित्र' मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित हुआ था। यह इस बात का प्रमाण है कि GPM क्षेत्र केवल प्रकृति और जनजातीय संस्कृति में ही नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान और पत्रकारिता में भी अग्रणी रहा है।

GPM जिला छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में अपनी जनजातीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण विशेष पहचान रखता है।

GPM की लोक संस्कृति का संरक्षण क्यों जरूरी है?

आज के आधुनिकीकरण के दौर में GPM क्षेत्र की लोक कला, संगीत और नृत्य को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। ये परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से एक-दूसरे को सौंपी जाती रही हैं। अगर इन्हें दस्तावेज़ीकरण, प्रोत्साहन और सरकारी सहयोग मिले, तो ये अनमोल धरोहरें न केवल जीवित रहेंगी बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध बनाएंगी।

निष्कर्ष

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ जंगल के हर पेड़ में देवता बसते हैं, हर ढोल की थाप में इतिहास गूँजता है और हर गीत में जीवन की एक नई कहानी है। यहाँ की गोंड और बैगा जनजाति की करमा नृत्य, रीना-सैला, बिलमा, परघोनी, सुआ नृत्य और फाग नृत्य जैसी परंपराएँ इस क्षेत्र को एक जीवंत सांस्कृतिक मानचित्र पर स्थापित करती हैं।

अगर आप छत्तीसगढ़ की असली आत्मा को महसूस करना चाहते हैं, तो GPM जिले की यात्रा ज़रूर करें — यहाँ आपको न केवल प्रकृति का सौंदर्य मिलेगा, बल्कि भारत की प्राचीनतम जनजातीय कला और संस्कृति की अमूल्य विरासत से भी साक्षात्कार होगा।

FAQs

प्रश्न 1: GPM जिले की सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य कौन सी है?

GPM जिले की सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य करमा नृत्य है। यह गोंड और बैगा जनजाति द्वारा किया जाता है। इसमें पुरुष मांदर-ढोल बजाते हैं और महिलाएँ एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर गोलाकार घेरे में नाचती हैं। यह नृत्य करमा देव को प्रसन्न करने के लिए भादो पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा के बीच किया जाता है।

प्रश्न 2: GPM क्षेत्र में कौन-कौन सी प्रमुख जनजातियाँ निवास करती हैं और उनकी सांस्कृतिक विशेषता क्या है?

GPM जिले में मुख्य रूप से गोंड और बैगा जनजातियाँ निवास करती हैं। जिले की कुल जनसंख्या का 57.09% अनुसूचित जनजाति है। गोंड जनजाति माड़ई उत्सव, करमा नृत्य और गोंडी भाषा के लिए जानी जाती है, जबकि बैगा जनजाति अपनी अनूठी गोदना (टैटू) कला, रीना-सैला नृत्य और परघोनी नृत्य के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 3: GPM जिले में कौन से प्रमुख आदिवासी त्योहार मनाए जाते हैं?

GPM जिले में माड़ई उत्सव, करमा पर्व, हरेली, नवाखानी और छेर-छेरा प्रमुख आदिवासी त्योहार हैं। माड़ई उत्सव गोंड जनजाति का रंगारंग मेला है जो फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। करमा पर्व भादो पूर्णिमा पर होता है जिसमें रात भर गीत-नृत्य होते हैं।

प्रश्न 4: GPM क्षेत्र के पारंपरिक वाद्य यंत्र कौन से हैं?

GPM क्षेत्र के प्रमुख पारंपरिक वाद्य यंत्रों में मांदर (मिट्टी का ढोल), ढोल, टीमकी, बाँसुरी, ठिसकी और पैजना (पैरों में पहना जाने वाला घुंघरू) शामिल हैं। मांदर और ढोल की थाप के बिना यहाँ का कोई भी उत्सव अधूरा माना जाता है।

प्रश्न 5: GPM जिले की लोक संस्कृति को देखने के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

GPM जिले की लोक संस्कृति और आदिवासी उत्सवों का अनुभव लेने के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उपयुक्त है। इस अवधि में माड़ई उत्सव, करमा पर्व, दीपावली पर सुआ नृत्य और छेर-छेरा जैसे त्योहार मनाए जाते हैं। होली के समय (फरवरी-मार्च) में फाग नृत्य और फाग गीत का विशेष आयोजन होता है।

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